Sanjeevani Kriya
संजीवनी क्रिया

प्राणायाम का प्रामाणिक आधार
Sanjeevani Kriyaसंजीवनी क्रिया

Author: Swami Buddhpuri Ji स्वामी बुद्धपुरी जी
Format: Paperback
Language: Hindi
ISBN: 9788178062204
Code: 9716J
Pages: 144
List Price: US$ 5.00
Price: US$ 4.00   You Save: US$ 1.00 (20.00%)

Published: 1970
Publisher: Unicorn Books
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यह पुस्तक योग–साधना (आसन–प्राणायाम) विषयक कोई नया दृष्टिकोण नहीं प्रतिपादित कर रही है, बल्कि यह तो हमें उससे भी आवश्यक तथ्य से परिचित कराता है, वह है जीवनदायी श्वास का विज्ञान और उसे शरीर में पूर्णतया भरने की कला। क्योंकि अधूरा और उथला श्वास न केवल हमारी जीवनी–शक्ति में कमी लाता है बल्कि Anti-oxidants की मात्रा घटाकर Free Radicals के रूप में शरीर में जहर भी जमा करता जाता है। संजीवनी क्रिया उक्त Free Radicals को अवशोषित कर इन सारी समस्याओं का सहज ही समाधान करती है और हमारे शरीर को निरोग तथा दीर्घायु बनाने में अत्यन्त प्रभावशाली सिद्ध होती है।
यह मात्रा आश्चर्य ही नहीं दु:ख की भी बात है कि लोग जीवन की समस्त क्रियाकलापों के आधारभूत श्वास विज्ञान के बारे में शिक्षा प्राप्त करने का तनिक भी प्रयास नहीं करते और अनजाने ही जीवनपर्यन्त अधूरा तथा मृत्युग्रसित श्वास लेते रहते हैं। यह पुस्तक इस दिशा में प्रथम प्रामाणिक प्रयास है जो लेखक की 40 वर्षों की साधना और लाखों लोगों पर किये गये प्रायोगिक अनुभवों पर आधारित है।

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About the Author(s)

स्वामी बुद्ध (पुरी जी पूर्वाश्रम में IIT Delhi से M.Tech. की शिक्षा प्राप्त कर कुछ समय तक MNREC इलाहाबाद में अध्यापन कार्य करते रहे। अनेक वर्षों तक वेद–शास्त्रों तथा योगादि विषयक ग्रन्थों का अन्वेषण और तत्सम्बन्धी साधनों का प्रयोग करते रहे। हिमालय क्षेत्र में तपस्यापूर्वक महायोग का साक्षात् अनुभव करने के उपरान्त अब जनसामान्य के लिए उन गम्भीर रहस्यों को सरल रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
सिद्धामृत–सूर्य–क्रियायोग (सूर्य ऊर्जा से आरोग्य तथा शक्ति प्राप्त करने की साधना) अग्नि–क्रियायोग (अग्नि के सान्निध्य में रोग–निवारण तथा शक्ति जागरण की साधना), संजीवनी–क्रियायोग (शरीर में प्राण–ऊर्जा को नख से शिख तक भरने की शक्तिशाली साधना) आदि के रूप में उन्होंने अनेक महायोगीय साधनाओं का आविष्कार किया है। इनके बल पर वर्ष 2004 से वह स्वयं अन्न–जल–निद्रा तथा रोगादिकों पर विजय प्राप्त करके एकान्त साधना में रत हैं। प्राय: देश–विदेश के अनेक पत्र व पत्रिकाओं के अलावा निरोगधाम तथा वैद्यराज सदृश स्वास्थ्य पत्रिकाओं में भी स्वामी जी द्वारा आविष्कृत चमत्कारी साधनाओं के विषय में लेख छपते रहते हैं।

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